उत्तराखंड की ऐपण कला: सांस्कृतिक विरासत का बेजोड़ नमूना

on February 07, 2020

Aipan art of Uttarakhand

देवभूमि उत्तराखंड का इतिहास बड़ा ही समृद्ध रहा है। अपने अंदर यह राज्य न जाने कितनी ही प्रकार की सांस्कृतिक विरासत को समेटे हुए है। उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में से एक उत्तराखंड की ऐपण कला भी है, जो वास्तव में अद्भुत है, बेमिसाल है, कला का दिलकश नमूना है। इस लेख में हम आपको उत्तराखंड की परंपरागत कलाओं में से एक ऐपण की परंपरा के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

 

क्या है उत्तराखंड की ऐपण कला

ऐपण के शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो इसका तात्पर्य है लेपन करना या सजावट करना। वही लेपन जो अक्सर किसी धार्मिक या फिर मांगलिक अवसर पर घरों को सजाने के लिए किया जाता है। उत्तराखंड तो देवभूमि कहलाती है। मंदिरों की यहां भरमार है। उत्तराखंड की संस्कृति में ही धर्म बसा है। ऐसे में यहां किसी भी शुभ कार्य के दौरान ऐपण न बनाये जाएं, ऐसा हो ही नहीं सकता। मंदिरों से लेकर घरों तक में धार्मिक अनुष्ठानों और आयोजनों के दौरान एवं मांगलिक कार्यों के समय ऐपण बनते-ही-बनते हैं। सबसे पहले तो ऐपण बनाने के लिए उस जगह को गेरू यानी कि लाल मिट्टी से अच्छी तरह से लेप दिया जाता है। लिपाई के सूखने के बाद पिसे गये चावल को गीला करके उसे पतला बनाकर उंगलियों से कलाकृतियां बनाई जाती हैं, जो वाकई शानदार दिखती हैं। शुभ कार्य के लिए बनाई जाने वाली इन कलाकृतियों को बसंत धारे के नाम से भी जानते हैं।

 

कुमाऊं की ऐपण कला से जुड़े जानने योग्य तथ्य

  • ऐपण को भिप्ति चित्रों, लिख थाप एवं थापा के नाम से भी जानते हैं। अपने पूर्व का जन्मस्थान इलाहाबाद के झूसी को मानने वाले साहों और अपना मूल स्थान महाराष्ट्र एवं गुजरात को मानने वाले ब्राह्मणों के ऐपण में भिन्नता होती है। साहों के ऐपण में धरातलीय आलेखन तो ब्राह्मणों की ही तरह होते हैं, मगर इनमें भिप्ति चित्रों की रचना की परंपरा का प्रमुख स्थान है। दीवारों या फिर कागज पर थापा श्रेणी चित्र उकेरे जाते हैं। ब्राह्मण जब ऐपण बनाते हैं तो गेरु मिट्टी से जमीन को लेप कर चावल के आटे से तैयार घोल से ऐपण बनाते हैं, जबकि साह ऐपण बनाने से पहले चावल के आटे के घोल में हल्दी मिलाकर उसे हल्का पीला जरूर कर देते हैं।
  • साहों के यहां ‘वर’ नामक ऐपण की ओर विशेष शैली प्रचलित है। बूंदों की संख्या के आधार पर इसमें डिजाइन के अभिप्राय भी बदलते जाते हैं। इसमें आलेखण का नाम ही ज्योमितीय अलंकरण के साथ बूंदों की संख्या और विशेष रंग के निर्धारण आदि पर आधारित हैं। थापा पट्टा शैली एवं ज्यूति मातृका शैलियां सिर्फ चंपावत या इससे सटे हुए कुछ इलाकों में ही ब्राह्मणों एवं साह परिवारों के बीच देखने को मिलती हैं।

 

कुमाऊं की ऐपण कला में प्रचलित प्रमुख ऐपण

सरस्वती पीठ

इसमें ऐपण का निर्माण तीन तरह से होता है। एक प्रकार में गेरु मिट्टी से जमीन को लेप कर चावल के घोर से रेखा बनाकर ऐपण बनाये जाते हैं। एक और प्रकार में एक से नौ तक बिंदु बनाकर रेखा के जरिये इन्हें जोड़ दिया जाता है और इसी पर देवताओं की प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है। इसी तरह से अन्य प्रकार में बिंदुओं को जोड़कर स्वास्तिक की आकृति तैयार की जाती है, जो सामान्यतः नवरात्रि के दौरान देवताओं की स्थापना और उनकी पूजा के लिए बनाई जाती है। देव स्थल में मुख्य दीपक जलाने के लिए पांच तत्वों पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और अग्नि को प्रदर्शित करते पांच कोण वाले तारे का निर्माण एक अन्य प्रकार के ऐपण में किया जाता है।

 

महालक्ष्मी पूजन के लिए चौकी बनाकर

इसमें नौ बिंदुओं के जरिये ऐपण बनाया जाता है, जिसमें चौकी के चारों तरफ दो पैरों की छाप बना दी जाती है। ये एक अलंकृत बेल की तरह दिखते हैं। कुछ परिवारों में आठ कोण वाले कमल बनाने की भी परंपरा का पालन किया जाता है।

 

महालक्ष्मी के पट्टे वाला प्रकार

ऐपण के इस प्रकार के महालक्ष्मी को चार भुजाओं के साथ बनाया जाता है, जो कमल की पंखुड़ियों के बीच होती हैं। इसमें बाईं ओर के दो हाथों में चक्र एवं पद्म दिखाये जो हैं, जबकि दाईं ओर के हाथों में त्रिशूल बनाये जाते हैं। इसके नीचे नौ बिंदुओं वाली सरस्वती चौकी भी बनाई जाती है और महालक्ष्मी के दोनों तरफ दो-दो हाथी बनाये जाते हैं सूंड उठाये हुए जल कलश से लक्ष्मी पर जल डाल रहे होते हैं।

 

जनेऊ पीठ

इसमें षट्कोण बनाकर जो रचना बनती है उसमें सात यंत्रों की छटा नजर आती है, जो सप्तऋषियों कश्यप, भारद्वाज, अत्रि, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ और विश्वामित्र को प्रदर्शित करती हैं। और भी कई तरह तरीके इसमें इस्तेमाल में आते हैं और जनेऊ या उपनयन संस्कार के समय ये जरूर से बनाये जाते हैं।

 

शिव पीठ यंत्र

सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा के वक्त इसे जरूर बनाया जाता है। एक प्रकार में तो इसमें आलेखन 12-12 बिंदुओं, जबकि दूसरे प्रकार में 16-16 बिंदुओं को मिलाकर किया जाता है।

 

सूर्य चौकी

नामकरण संस्कार के बाद जब शिशु को सबसे पहले रोशनी में लाया जाता है तो तब इसे बनाया जाता है। साथ ही सूर्य व्रत के दौरान भी पौष माह में रविवार को इसे बनाया जाता है।

 

विवाह का ज्यूति पट्टा

इस तरह के ऐपण में केंद्र में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती को बनाया जाता है और साथ में इनके सूर्य, गणेश, चंद्र के साथ 16 मातृकाएं भी अंकित होती हैं। बड़े और छोटे हिमालय को भी इसमें अंकित किया जाता है।

 

अन्य प्रकार के प्रचलित ऐपण

इसके अलावा भी कई तरह ऐपण प्रचलित हैं, जिनमें स्यो, नाता, धुंया, धूलि अध्र्य की चौकी, मुहाली, द्वार मातृ, माई तथा विजन, यज्ञोपवीत का ज्यूति पट्टा, छट्टी की ज्यूति व सामान्य ज्यूति, ज्यूति मातृका चौकी, जन्माष्टमी का पट्टा या थापा, हरशयनी पट्टा, हर बोधिनी पट्टा, दूर्वाष्टमी और डोर दुवज्योड़ा पट्टा और नवदुर्गा पट्टा आदि भी शामिल हैं।

 

निष्कर्ष

उत्तराखंड की परंपरागत कलाओं में से एक ऐपण की परंपरा प्राचीन काल से ही यहां त्योहारों और शुभ आयोजनों पर देखने को मिलती रही है। इसलिए उत्तराखंड की ऐपण कला को यहां की सांस्कृतिक विरासत का बेजोड़ नमूना कह सकते हैं।

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