उत्तराखंड के लिए किसी वरदान से कम नहीं 'बुरांश', जानिए इन अचूक फायदों के बारे में

on March 05, 2020

buransh and its health benefits

देवताओं का वास हमारे उत्तराखंड की इस पावन भूमि के कण-कण में है। तभी तो इसे "देवभूमि" के नाम से जाना जाता है। प्रकृति ने इसे अनेक प्रकार के फल-फूल, वृक्ष, औषधि व रमणीय स्थलों से अलंकृत किया है। आज हम बात करेंगे एक ऐसे ही औषद्यीय गुणों से युक्त देव तुल्य वृक्ष की, जो देवता स्वरूप पर्वतों के मस्तक की शोभा बढ़ा रहा है। इसे उत्तराखंड राज्य के "राजकीय वृक्ष" होने का गौरव प्राप्त है। इसके पुष्प को "हिमांचल प्रदेश" तथा "नेपाल" में राजकीय पुष्प का दर्जा हासिल है। राज्य में प्रचलित लोकगाथाओं तथा लोकगीतों ने इसकी महत्ता को अमर बना दिया है।

"बुरांश" नाम सुनते ही दिमाग में इसके लाल चटक रंग के चित्र तथा मुंह में इसके खट्टे-मीठे स्वाद का अनुभव होता है। इसका वानस्पतिक नाम "रोडोडेंड्रोन" (Rhododenran ) है और यह एरिकेसिई कुल का वृक्ष है। यह उत्तराखंड, हिमांचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश और नेपाल के साथ चीन, जापान, म्यामांर, थाईलैण्ड, मलयेशिया, इंडोनेशिया, फिलीपीन्स, न्यू गुनिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, दक्षिणी यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका आदि देशों में भी पाया जाता है। दुनियाभर में इसकी 1000 से अधिक प्रजातियां पायी जाती हैं। यह भारत में प्रमुख रूप से उच्च हिमालयी क्षेत्रों में 1500 से 3600 मीटर तक की ऊंचाई पर पाया जाता है। इसकी औसत लम्बाई 25 फुट तक होती है। वर्षभर हरा-भरा रहने वाला यह वृक्ष मार्च-अप्रैल में सुगंधित लाल फूलों से अच्छादित हो जाता है। उत्तराखण्ड में मुख्यतः लाल तथा सफ़ेद रंग के फूल वाले बुरांश वृक्ष पाए जाते हैं। उत्तराखण्ड में बुरांश की मुख्यतः अरबोरियम (arborium) और किन्नाबेरियम (Cinnaberium ) प्रजातियां पाई जाती हैं। इन दो प्रजातियों की सबसे बड़ी खूबी है कि इनकी पत्तियों में सबसे ज्यादा Proline का जमाव पाया जाता है, जिसकी वजह से कम तापमान को सहने की इसकी क्षमता बढ़ जाती है।

उत्तराखण्ड का बुरांश वैसे भी अपनी खुबसूरती, स्वाद तथा कई औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है, जिसकी वजह से बाजार में बुरांश से निर्मित कई तरह के खाद्य पदार्थ जैसे कि जूस, चटनी तथा आयुर्वेदिक औषधियों की मांग है। आइए आज हम इसके विभिन्न उपयोगों पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

खाद्य पदार्थ के रूप में

उत्तराखण्ड में बुरांश के प्रत्येक भाग का उपयोग विभिन्न कार्यों के लिए किया जाता है। बुरांश के फूल से जूस, जैम तथा चटनी आदि बनाये जाते रहे हैं। इसके फूलों की चटनी बहुत ही स्वादिष्ट होती है, जो कि लू और नकसीर से बचने का असरदार आयुर्वेदिक उपाय है। इसकी पंखुड़ियां लोग सुखाकर वर्ष भर उसका उपयोग चटनी के रूप में करते हैं। बुरांश की पत्तियों में अच्छी पौष्टिकता के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पशुचारे के रूप में प्रमुखता से इसे उपयोग में लाया जाता है।

आयुर्वेदिक औषधि के रूप में

प्राचीन समय से ही राज्य में बुरांश का प्रयोग घरेलू उपचार में प्रमुखता से किया जाता रहा है। जैसे कि तेज बुखार, सिर-दर्द, गठिया, फेफड़े सम्बन्धी रोगों में, इन्फ्लेमेशन, उच्च रक्तचाप तथा पाचन सम्बन्धी रोगों में, हृदय सम्बन्धी बीमारी, डाइबिटीज, कैंसर और लिवर के लिए यह बहुत लाभकारी है। बुरांस के फूल में मीथेनाॅल होता है, जो कि डाइबिटीज के रोगियों के लिए फायदेमंद है। यह शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को नियमित रखता है और हायपरटेंशन व डायरिया में भी लाभकारी है। बुरांश के फूल में विटामिन A, B-1, B-2, C, E और K भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं, जिससे कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रहता है तथा इसमें पाए जाने वाले पिगमेंट्स क्यारेसीटीन, (Quercetin) और रूटीन (Rutin) के कारण हार्ट अटैक का खतरा कम होता है। इसके जूस की तासीर ठंडी होती है, जो दिमाग को शीतलता प्रदान करती है और एक अच्छा एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण यह त्वचा रोगों से बचाता है।

बुरांश औषधीय गुणों के साथ-साथ न्यूट्रिशनल भी है। इसके जूस में प्रोटीन 1.68 प्रतिशत, कार्बोहाइड्रेड 12.20 प्रतिशत, फाइवर 2.90 प्रतिशत, मैंग्नीज 50.2 पी0पी0एम0, कैल्शियम 405 पी0पी0एम0, जिंक 32 पी0पी0एम0, कॉपर 26 पी0पी0एम0 और सोडियम 385 पी0पी0एम0 तक पाये जाते हैं।बुरांश के विभिन्न औषधीय गुणो के कारण आयुर्वेदिक पद्धति की एक प्रसिद्ध दवा ‘अशोकारिष्ट’ में भी रोडोडेंड्रोन आरबोरियम का प्रयोग किया जाता है। अच्छी एंटीऑक्सीडेंट एक्टिविटी के साथ-साथ बुरांश में अच्छी एंटी डाइबिटिक, एंटी डायरिल तथा हिपेटोप्रोटिक्टिव एक्टिविटी होती है। बुरांश को हीमोग्लोबिन बढ़ाने, भूख बढ़ाने, आयरन की कमी दूर करने तथा हृदय रोगों में भी प्रयोग में लाया जाता है।

अन्य उपयोग

पहाड़ी क्षेत्रों के अनुकूल वातावरण में उगने वाला बुरांश के पौधे में लगने वाले फूलों के साथ ही इसकी पत्तियां और लकड़ियां भी बहुउपयोगी हैं। पर्यावरण संरक्षण में बुरांश का मत्वपूर्ण योगदान है। पत्तियां जैविक खाद बनाने में उपयोग में आती हैं। इसकी लकड़ी मुलायम होती है, जिस वजह से इसे लकड़ी के बर्तन व कृषि उपकरणों में हैंडल आदि बनाने में भी प्रयोग में लाया जाता रहा है।

हमारे पहाड़ी राज्य में आसानी से उग जाने वाले इस वृक्ष से हमें आर्थिक लाभ उठाने की आवश्यकता है। बुरांश में वो सारी खूबियां हैं, जो इसे हमारे राज्य की आर्थिक सम्पन्नता का द्योतक बना सकती है। बस जरुरत है बड़े स्तर पर बुरांश के संवर्धन, संरक्षण तथा कृषि को बढ़ावा देने की और राज्य के कुटीर तथा लघु उद्योग कार्यक्रम में बुरांश की खेती को सम्मिलित करने की। राष्ट्रीय स्तर पर बुरांश के जूस की अच्छी मांग है, जो कि अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में 30 डालर प्रति लीटर तक की कीमत में खरीदी जाती है। बाजार में रोडोडेंड्रोन सीरप की कीमत 150 यू0एस0 डालर प्रति लीटर तक है। दुनियाभर में बुरांश के इसेंसियल ऑयल की भी अच्छी डिमांड है।

अंत में

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बुरांश का वृक्ष हमारे उत्तराखंड के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। इसके महत्व को समझकर इसे प्रोत्साहित किया जाना राज्य के हित में होगा। यहां के लोगों के हित में होगा।

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