जीवन में मिठास घोलता स्वरोजगार - मधुमक्खी पालन

on June 21, 2020

बचपन में हमने किताबो में अक्सर एक बात पढ़ी है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत की अधिकांश economy कृषि पर आधारित है। बात जब कृषि की होती है, तो किसान का जिक्र हमेशा आता है। किसान के दो पक्के मित्र होते है, पहला केंचुआ - जो भूमि को उपजाऊ बनाता है, दूसरा हनीबी या मधुमक्खी- जो पर-परागण के द्वारा फसलों की पैदावार बढ़ाती है। चूँकि बात कृषि प्रधान देश की है, तो यहां पर ऐसे छोटे- बड़े उद्योगों की अपार सम्भावनाये हैं जो कृषि पर आधारित हो या फिर कृषि से सम्बंधित हो। आज हम ऐसे ही छोटे से परन्तु मिठास भरे उद्योग की बात करेंगे जो साक्षर बेरोजगारी की राह पर निकल पड़े युवाओ के लिए आत्मनिर्भर बनने की राह प्रशस्त करता है, जिसका नाम है मधुमक्खी पालन ।

Beekeeping in Uttarakhand

उत्तराखण्डी भाषा में मधुमक्खी को "मौन" कहा जाता है, और मधुमक्खी पालन को स्थानीय भाषा में 'मौन-पालन' भी कहा जाता है। प्राचीन काल में शौक के लिए या फिर निजी उपयोग में शहद के लिए मधुमक्खी का पालन किया जाता था।

वर्तमान में यदि सही वैज्ञानिक तकनीक से मधुमक्खी पालन को बढ़ावा दिया जाये, तो यह एक सफल लघु उद्योग बनकर उभरने की क्षमता रखता है। यह एक पूर्णतया आर्गेनिक उत्पाद है और आज के दौर में आर्गेनिक उत्पादों की मांग की पूर्ति करता है।भारत सरकार एवं उत्तराखण्ड राज्य सरकार के द्वारा मधुमक्खी पालन प्रोत्साहन हेतु बहुत सी योजनायें समय -समय पर चलायी जाती हैं। तो आइये जानते हैं मधुमक्खी पालन से सम्बंधित बाटों को विस्तार से। 

उत्तराखण्ड में मधुमक्खी पालन की अपार सम्भावनायें 

  • उत्तराखण्ड राज्य में एक शहद क्वालिटी कन्ट्रोल लैब स्थापित की जाएगी इसके साथ ही सरकार ने मौनपालको को दी जाने वाली प्रोत्साहन राशि को बढ़ा कर 50 लाख से 1 करोड़ रूपये करने की भी घोषणा की गयी है।
  • उत्तराखण्ड को प्रकृति के द्वारा अनेक प्रकार के फल-फूलो से आच्छादित किया है जो की मधुमक्खी पालन के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है।  फूलो का पराग, जिसे मक्खी के द्वारा चूस के शहद का निर्माण किया जाता है वह यहाँ बहुताय में उपलब्ध है । इस दृष्टि से उत्तराखण्ड मधुमक्खी पालन के लिए एक आदर्श राज्य है । राज्य के फल-फूल एवं जड़ी -बूटियां शहद को और अधिक गुणकारी बना देती है।
  • मधुमक्खी पालन हेतु किसी बड़े भू-भाग की जरुरत नहीं होती है और न ही अधिक भारी भरकम बजट की जरुरत होती है। अतः इसे कम बजट में किसी भी कम भूमि वाले व्यक्ति द्वारा प्रारम्भ किया जा सकता है।
  • मधुमक्खी पालन, भारी परिश्रम वाला कार्य नहीं है। अतः इसे महिलाओ और बुज़ुर्गों द्वारा भी किया जा सकता है।
  • उत्तराखण्ड राज्य की प्रतिकूल भौतिक संरचना मधुमक्खी पालन को प्रभावित नहीं करती है। बल्कि यहां का वनो से आच्छादित शांत प्रदेश इसके लिए उपयोगी साबित होता है क्योकि मक्खी बॉक्स को भीड़भाड़ तथा रिहायशी इलाको से दूर स्थापित करने की आवश्यकता होती है।
  • ग्रीष्मऋतु में मधुमक्खी को लू से बचाने के लिए विशेष रक्षण की आवश्यकता होती है। चूँकि राज्य की जलवायु दशा ग्रीष्म काल में भी सुहावनी रहती है। अतः बिना विशेष प्रबंध के आसानी से मधुमक्खी पालन किया जा सकता है।
  • उत्तराखण्ड सरकार ने मधुमक्खी पालन को प्रोत्साहन देने के लिए मधुमक्खियों का तीन महीने का भोजन सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों से देने का फैसला लिया है। मधुमक्खियों का भोजन चीनी है और जून जुलाई और अगस्त के वर्षाकाल में जब प्राकृतिक फूलों में कमी होती है एसे में मधुमक्खियों को खिलाने के लिए मधुमक्खी पालक चीनी का इस्तेमाल भी करते हैं ।
  • राज्य में मधुमक्खी पालन से सम्बंधित उपकरण एवं संसाधन आसानी से उपलब्ध हैं । राज्य में देहरादून , नैनीताल तथा अल्मोड़ा आदि स्थानों में मौन-पालन से सम्बंधित उद्योग स्थापित हैं । राज्य में स्थित पंडित गोविन्द बल्लभ पंत कृषि विश्वविद्यालय इस क्षेत्र में योगदान के लिए प्रतिबद्ध है, यहाँ पर इस सम्बन्ध में अनेक शोध कार्य संचालित होते रहे हैं ।

मधुमक्खी पालन 

  • मधुमक्खीपालन हेतु किसी मान्यता प्राप्त संस्थान/कृषि विश्वविद्यालय /खादी ग्रामोउद्योग संघ / मान्यता प्राप्त स्वयं सेवी संगठन द्वारा तकनीकी प्रशिक्षण लेना चाहिए।
  • मधुमक्खियों की दो प्रमुख प्रजातियों हैं एपिस सेरेना और एपिस मेलिफेरा, जिसमे से पहली को भारतीय मधुमखी कहा जाता है और दूसरी को यूरोपियन या इटेलियन मधुमक्खी के नाम से जाना जाता है। इनके अतिरिक्त मधुमखी की और भी प्रजातियां हैं जिन्हें जैसे छोटी मधुमक्खी, सारंग मधुमक्खी आदि। ये कहा जाता है की मधुमक्खियों के झुण्ड में तीन प्रकार की मधुमक्खियां होती है, जिन्हें हम रानी, नर तथा श्रमिक के नाम से जानते हैं । किसी भी झुण्ड में केवल एक ही रानी मक्खी होती है, जिसका कार्य अंडे देना होता है। यह भी कहा जाता है की मधुमखी के झुण्ड में एक रानी और बाकी नर मखियाँ होती हैं जिनमे नर मक्खियों की संख्या 100 तक हो सकती है। श्रमिक मक्खियां सबसे ज़ादा होती हैं और इनका कार्य होता है मधु को एकत्रित करना।
  • साधारणतया मधु मक्खियां फूलो से पराग एकत्रित करती हैं और पराग के जटिल सूक्रोज को दो सरल सुक्रोस, फ्रुक्टोज और ग्लूकोज में तोड़ देती हैं।
  • एपीस सेरेना मधु मक्खी की 15 कालोनी से हर वर्ष लगभग 250 किलोग्राम शहद की प्राप्ति होती है। इनकी दूसरी प्रजाति, ऐपिस मेल्लिफेरा की 15 कालोनी से प्रतिवर्ष 400 किलोग्राम शहद की प्राप्ति होती है।
  • शहद की गुणवत्ता उसके पराग पर निर्भर करती है, अर्थात यदि किसी शहद का निर्माण जामुन के पराग से हुआ है तो उनके गुण आम के पराग से निर्मित शहद से भिन्न होंगे। तथापि शहद का निर्माण किसी भी फूल के पराग से हो, लेकिन शहद स्वास्थ्य के लिए लाभदायक ही है ।
  • श्रमिक मक्खियां ही डंक मारती हैं , इनके डंक से सूजन आ जाती है और दर्द भी होता है परन्तु इनका डंक हानिकारक नहीं होता, राज्य में तो इसे गठिया, जोड़ों के दर्द और अन्य कई परेशानियों में उपयोगी समझा जाता है।
  • आपको बता दें की रानी मक्खी की औसत आयु एक से दो वर्ष ही होती है वहीँ नर मक्खी की औसत आयु 5-6 माह और श्रमिक मक्खी की औसत आयु 45 दिन है।
  • शहद के अतिरिक्त मधु मक्खी से मोम की प्राप्ति भी होती है। शायद आप नहीं जानते होंगे लेकिन मोम से ही मधुमक्खी के छत्ते का निर्माण भी होता है। मोम के निर्माण के लिए मक्खी शहद को खाती है और अपनी ग्रंथियों द्वारा मोम के टुकड़ो का निर्माण करती है।
  • एपीस सेरेना व ऐपिस मेल्लिफेरा मधुमक्खी की 15 कॉलोनियों से प्रतिवर्ष लगभग दो से तीन किलोग्राम मोम प्राप्त किया जाता है।  
  • मधुमक्खी एक परोपकारी तथा सामाजिक कीट होती है लेकिन इसके कुछ शत्रु भी हैं जैसे -  बर्र, ड्रैगन फ्लाई, भालू, बन्दर , गिरगिट , मकड़ी मोमी कीड़ा आदि। अतः एक अच्छे मौन-पालक को इन शत्रुओ से सावधान रहने की ज़रूरत भी है।   

उपयोग 

  • शहद का उपयोग हम प्रयक्ष तथा परोक्ष दोनों रूप में करते है। प्रत्यक्ष रूप से हम शहद का सेवन अच्छे स्वास्थ्य के लिए करते है। परोक्ष रूप से शहद अनेक प्रकार की दवाइयों में प्रयोग किया जाता है।
  • शहद का उपयोग हम प्रयक्ष तथा परोक्ष दोनों रूप में करते हैं। प्रत्यक्ष रूप से हम शहद का सेवन अच्छे स्वास्थ्य के लिए करते हैं। परोक्ष रूप से शहद अनेक प्रकार की दवाइयों में प्रयोग किया जाता है।
  • शहद का उपयोग जले-कटे में, मधुमेह की रोकथाम में, कोलेस्ट्रॉल कम करने में, वजन कम करने में, सौंदर्य प्रसाधनों में और उच्च रक्त चाप नियंत्रण में के लिए प्रमुखता से किया जाता है।
  • मधुमक्खी से प्राप्त होने वाले मोम का लघु उद्योगों में बहुत महत्तव है । मोम से मोमबत्ती बनाने के लिए कुटीर उद्योगों द्वारा इसके इस्तेमाल बाहरी मात्रा में किया जाता है ।
  • इसके अतिरिक्त सौन्दर्य प्रसाधनो बहुतायत में इसका प्रयोग किया जाता है।
    मधुमक्खी से प्राप्त होने वाले मोम का इस्तेमाल ना सर लघु उद्योगों में होता है बल्कि गठिया और जोड़ो के दर्द में भी ये राहत पहुंचाता है ।

 

 मधुमक्खी पालन के लाभ 

  • मधुमक्खी पालन से ना सिर्फ शहद बल्कि मोम और मधु गोंद (प्रोपोलिस) की भी प्राप्ति होती है।
  • मधुमक्खी द्वारा फसलों में पर-परागण की क्रिया से उत्पादन में औसतन 15 से 30 प्रतिशत वृद्धि होती है| इस वृधि के लिए कृषक को किसी प्रकार का निवेश नहीं करना होता है और इसके पालन से शहद एक उत्पाद के रूप में प्राप्त भी होता है|
  • रायलजेली प्रकृति का सबसे अधिक पौष्टिक पदार्थ है, जिसका उपयोग रानी मक्खी भोजन के रूप में करती है। कहा जाता है की इसके नियमित सेवन मनुष्य की आयु लम्बी होती है |
    मौन विष का उत्पादन भी किया जाता है, विष संग्रह यंत्र को इसके लिए प्रयोग में लाया जाता है | इस विष का उपयोग दवा के रूप में किया जाता है। गठिया के लिए भी इसे इस्तेमाल किया जाता है|
  • मौनवंश वृधि करके, नर्सरी स्थापित की जा सकती है जिसे एक कुटीर उद्योग के रूप जिसे मधुमक्खी पालन कहते हैं, स्थापित किया जा सकता है।
  • मधुमखियों द्वारा जो मौनगोंद (प्रोपोलिस) का निर्माण छत्ते की मरम्मत के लिए किया जाता है वह चर्म रोग के उपचार के लिए भी इस्तेमाल में लाया जाता है ।

चलते चलते 

एक अनुमान के अनुसार, उत्तराखंड राज्य में 2083 मीट्रिक टन शहद प्रतिवर्ष उत्पादित किया जा रहा है। राज्य के 4600 किसान मौनपालन से जुड़े हुए हैं। राज्य में मधुमक्खी पालन हरिद्वार, देहरादून, ऊधमसिंहनगर और नैनीताल जिलें में ही प्रमुख रूप से होता है। वर्तमान में मुख्यमंत्री रोजगार योजना के अंतगर्त मधुमक्खी पालन हेतु ऋण भारी सब्सिडी के साथ उपलब्ध कराया जा रहा है। इस अवसर का लाभ उठाकर, वैज्ञानिक तकनीक से यदि मधुमक्खी पालन का कार्य किया जाये तो, स्वयं तथा अन्य लोगो के लिए रोजगार सृजन किया जा सकता है। 

LEAVE A COMMENT

Please note, comments must be approved before they are published


BACK TO TOP