आस्था, हरियाली और जीवन का पावन संगम है हरेला पर्व

on April 09, 2020

Harela festival of Uttarakhand

 

उत्तराखंड राज्य प्रकृति की गोद में बसा हुआ है। यही वजह है कि यहां मनाये जाने वाले हरेक त्योहार या पर्व में प्रकृति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सम्मिलित रहती ही है। यहां हम आपको उत्तराखंड के ऐसे ही एक हरे-भरे त्योहार के बारे में बता रहे हैं, जिसे स्थानीय भाषा में ‘हरेला’ या ‘हरियाली’ पर्व के नाम से जाता है। उत्तराखंड में  हरेला पर्व तीन अलग-अलग माह चैत्र, श्रावण एवं आश्विन में मनाया जाता है। फिर भी सबसे अधिक महत्व इनमें श्रावण मास में मनाये जाने वाले हरेला पर्व का है, क्योकि भगवान शिव का निवास स्थान उत्तराखंड में ही माना जाता है और भगवान शिव को श्रावण मास बेहद प्रिय भी है। 

कैसे हुयी हरेला शब्द की उत्पत्ति ?

हरेला शब्द की उत्पत्ति हरियाली शब्द से हुई है और हरियाली जीवन में खुशी एवं समृद्धि का प्रतीक है। हरेला पर्व उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में श्रावण (सावन) माह की प्रथम तिथि (कर्क संक्रांति या 16 जुलाई के आसपास) को मनाया जाता है। इस पर्व को मनाये जाने की वजह इसके नाम में ही निहित है। हरेला त्योहार हरियाली से प्रेरित है। इस समय कुमाऊं क्षेत्र में वर्षा ऋतु का आगमन होता है और चारों ओर हरियाली का वातावरण रहता है। ग्रीष्म ऋतु के पश्चात् वर्षा ऋतु के आगमन से पेड़-पौधे हरे-भरे हो उठते हैं। बेल वाले फल एवं सब्जियों में रंग-बिरंगे सुंदर फूल खिल उठते हैं। चारों ओर प्रकृति का अद्भुत हरियाली रूप खिल उठता है।

 क्या करते हैं इस दिन? 

श्रावण मास से नौ दिन पहले स्थानीय लोग शुद्ध व पवित्र स्थानों जैसे कि मंदिर या पूज्य वृक्षों के पास की सूखी मिट्टी को एकत्रित करके घर ले आते हैं। उस मिट्टी को साफ करके छान लेते हैं। इसके बाद मालु वृक्ष की पत्तियों से दोने (छोटी कटोरीनुमा टोकरी) बनाते है, जिनकी संख्या 3 या 5 या फिर 7 हो सकती है। साथ में 5, या 7 या फिर 9 प्रकार के साबुत अनाज जैसे कि गेहूं, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों, मक्का आदि को आपस में मिलाकर उनका मिश्रण तैयार कर लेते हैं। उसके पश्चात् लाई गई शुद्ध मिट्टी को इन दोनों में अच्छे तरह से भर लिया जाता है और उनमे साबुत अनाज के मिश्रण को बो दिया जाता है। प्रायः इसे घर में मंदिर के पास ही अंधकार वाले स्थान में रखा जाता है, ताकि प्रकाश यहां आसानी से न पहुंच पाए। उत्तराखंड के कई गांवों में सामूहिक रूप से भी हरेले की बुआई की जाती है। इस दौरान गांव के मंदिर में सभी मिलकर हरेले को बोते हैं।

समृद्धि से जुड़ा है हरेला 

नित्य सुबह हरेले को पानी दिया जाता है। हरेला पर्व से एक दिन पहले बोये गये हरेले की दाड़िम (अनार) की टहनी से गुड़ाई की जाती है। फिर इसके चारों ओर कलावा धागा बांध दिया जाता है। इस तरह से हरेले की 9 दिनों तक एक पूज्य फसल के तौर पर बोआई, निराई तथा गुड़ाई की जाती है। हरेले को समृद्धि के साथ जोड़ कर देखा जाता है। जिसका हरेला जितना अच्छा और लंबा होगा, उसकी फसल उतनी समृद्ध मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि उसके घर पूरे वर्ष धन-धान्य की परिपूर्णता रहती है।

 देवताओं को समर्पित 

हरेला पर्व के दिन यानी कि सावन मास की प्रथम तिथि को सुबह में हरेले की पूजा की जाती है। इसके बाद इसे काटकर सर्वप्रथम मंदिर के देवी-देवताओं को चढ़ाया जाता है। उसके बाद घर के छोटे-बड़े सभी सदस्यों को इसे चढ़ाया जाता है। इसे चढ़ाते समय घर के बड़े-बुजुर्गों द्वारा प्रायः स्थानीय भाषा में एक लोकगीत गाया जाता है, जिसके बोल जो इस प्रकार हैं- 

“जी रये, जागि रये, तिष्टिये, पनपिए,

दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइए,

हिमाल में ह्यूं छन तक,

गंग ज्यू में पांणि छन तक,

यो दिन और यो मास भेटनैं रये,

अगासाक चार उकाव, धरती चार चकाव है जये,

स्याव कस बुद्धि हो, स्यू जस पराण हो।” 

जैसा कि प्रारंभ में ही हमने आपको बताया कि उत्तराखंड के त्योहारों का संबंध प्रकृति से होता है। उसका यह भी प्रत्यक्ष उदाहरण है। इस लोकगीत में प्रकृति के साथ जुड़ाव दर्शाते हुए शुभाशीष प्रदान किया गया है। इसका अर्थ है कि आपकी आयु लंबी हो। आप दूब घास के समान समृद्ध बनें। जब तक हिमालय में बर्फ तथा गंगा जी में पानी है, आप जीवित रहें और इस त्योहार के दिन मिलने के लिए आते रहें। आप आसमान के जैसे ऊंचे तथा धरती के समान चैड़े हों। आपकी बुद्धि लोमड़ी के समान हो और शेर की तरह तुम में प्राणशक्ति हो। शाब्दिक रूप में यह पर्व मनुष्य को प्रकृति से जोड़ता है तथा उसका सम्मान करने की भावना को मजबूत बनाता है। 

आपसी सौहार्द्र को मिलता है प्रोत्साहन 

कुमाऊं क्षेत्र में हरेला पर्व बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन छोटे बच्चे गांव में घर-घर जाकर बड़े-बुजुर्गों को हरेला चढ़ाते हैं। बदले में उन्हें पैसे दिये जाते हैं। इस प्रकार यह त्योहार आपसी सौहार्द्र को बढ़ावा देता है। घरो के दरवाजों में हरेले को लगाया जाता है। जो लोग घर से बाहर आजीविका कमाने चले गये हैं, उन्हें पत्रों (चिट्ठियों) के माध्यम से हरेला भेजा जाता है, ताकि उनके जीवन में खुशहाली एवं समृद्धि बने रहे। चूंकि इस समय वर्षा ऋतु का आगमन होता है तो यह समय वृक्षारोपण के लिए उत्तम माना जाता है। इस दौरान वृक्षारोपण कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है तथा ग्रामीण इलाको में खेतो की मेड़ों पर वृक्षोरोपण किया जाता है, जिससे खेतों की भूमि का कटान रुक जाता है। बरसात के दिनों में भूमि-कटान पहाड़ों की आम समस्या है। इस प्रकार एक साथ दो उद्देश्यों की पूर्ति हो जाती है। एक तो वृक्षारोपण होता है और दूसरा मृदा का संरक्षण भी हो जाता है।

 मेले का आयोजन 

इस पर्व के दिन कुमाऊं क्षेत्र के जिलों में राजकीय अवकाश रहता है। अनेक स्थानों पर मेलों  तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। ऐसे ही एक प्रसिद्ध मेले का आयोजन नैनीताल जिले के भीमताल क्षेत्र में भी किया जाता है। ऐसा माना जाता है इस मेले का आयोजन अंग्रेजों के समय से ही किया जाता रहा है। इस मेले का आयोजन लगातार पांच दिनों तक किया जाता है। दूर-दूर के गांवों से ग्रामीण आकर मेले में खरीददारी करते हैं तथा यहां आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों व नुक्क्ड़-नाटकों का लुत्फ उठाते हैं। इस प्रकार इस मेले के माध्यम से आपस में वे मिलते-जुलते हैं। मेले के बहाने खरीददारी भी कर लेते हैं। 

चलते-चलते 

प्राचीन समय से ही इंसान प्रकृति का दोहन करता आया है। हरेला पर्व मानव को प्रकृति से जोड़कर हरियाली तथा जीवन को संरक्षित करने का पावन संदेश देता है। हरियाली यदि बची रही, तभी जीवन भी बचेगा। इस प्रकार से यह पर्व प्रकृति के संरक्षण के साथ इसके संवर्धन को भी अहमियत देता है।

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