स्वाद और पोषण से भरपूर है पहाड़ी इलाकों में उगाई जाने वाली ‘गडेरी’, फायदे जानकर रह जाएंगे दंग

on March 04, 2020

health benefits of pahari gaderiपहाड़ों के व्यंजनों की तो वैसे बात ही अलग होती है और कई पहाड़ी व्यंजन अपने स्वाद से लेकर पौष्टिकता तक की वजह से बड़े ही लोकप्रिय हैं, लेकिन यहां हम आपको एक ऐसी पहाड़ी सब्जी के बारे में बता रहे हैं, जिसका स्वाद लगभग हर एक पहाड़ी ने जरूर चखा होगा और जिसके बिना पहाड़ी व्यंजन अधूरे से लगते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं पहाड़ी गडेरी की जिसे कि ‘लाल पिनालू’ या  लाल अरबी कहा जाता है क्यूंकि ये अरबी जैसी दिखती है। लेकिन यह अर्बी नहीं है। गडेरी का आकार अरबी से काफी बड़ा होता है। और इसका स्वाद भी अरबी से बहुत अलग है।अंग्रेजी में इसे तारो रुट (taro root) कहा जाता है।

गडेरी एक उष्णकटिबन्धीय पौधा है जिसकी जड़ें जमीन के अंदर ही उगती हैं, इसकी जड़ को ही  गडेरी बोलते हैं जिसके कई प्रकार के पहाड़ी व्यंजन बनते हैं। इस लेख में हम आपको गडेरी के बारे में और इसके लाभ बताएँगे।

आलू से भी पुराना

यहां तक कि गडेरी की पत्तियों की भी सब्जी बनती है, जिसे गाबे की सब्जी के नाम से जाना जाता है। मुख्य रूप से गडेरी गर्मी और बरसात के मौसम की सब्जी है, जिसे हम आसानी से प्रिजर्व करके लम्बे समय तक इस्तेमाल में ले सकते हैं। तासीर इसकी बड़ी ठंडी होती है, लेकिन यदि आप इसका इस्तेमाल भांग और गन्दरैणी के बगार के साथ करते हैं, तो फिर इसकी तासीर गरम हो जाती है। सर्दी के मौसम में पहाड़ो में बहुतायत में यह सब्जी बनाई जाती है और लोग इसे खाते हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में, जहां पानी का अभाव होता है, वहां अन्य सब्जियों का उग पाना संभव नहीं होता। बरसात के मौसम में वहां इसे उगाया जाता है और साल भर लोग इसकी सब्जी बड़े चाव से खाते हैं। जब से हमारे देश में अंग्रेज आये, तभी से आलू का चलन हमारे देश में बढ़ा। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि उससे भी पहले के समय से पहाड़ो में गडेरी को उगाया जाता रहा है। इसी वजह से यह पहाड़ी आलू के नाम से भी मशहूर है।

पोषक तत्वों की भरमार

गडेरी के जो प्रकार उत्तराखंड में पाये जाते हैं, उनमें मुख्य रूप से राजाल, धावालु, काली-अलु, मंडले-अलु, गिमालु और रामालु शामिल हैं। गडेरी के पौधे की पत्तियों के साथ इसका जड़ और तना भी खाद्य सामग्री के तौर पर प्रयोग में आते हैं। इसके तने से बड़ी तैयार की जाती है। कई पोषक तत्वों जैसे कि विटामिन, पोटेशियम, कैल्शियम और प्रोटीन के साथ आयरन ,फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट आदि भी गडेरी में बड़ी मात्रा में पाये जाते हैं। एक और बड़ी विशेषता गडेरी की यह भी है कि इसमें वसा और कोलेस्ट्राल नाम मात्र के होते हैं, जिसकी वजह से बेहद खतरनाक बनती जा रही डायबिटीज के साथ हाई ब्लडप्रेशर, अवसाद और जानलेवा कैंसर व हृदय रोग आदि से भी हमारी रक्षा करने में यह सक्षम है।

अनेक हैं फायदे

औषधीय गुणों से भी गडेरी परिपूर्ण है, जिसकी वजह से इसका महत्व कई गुणा बढ़ जाता है। दिल के मरीजों के लिए तो यह खास तौर पर फायदेमंद है। उन्हें इसकी सब्जी जरूर खानी चाहिए। यही नहीं, महिलाओं के लिए भी यह लाभकारी मानी जाती है। वे महिलाएं, जो बच्चों को दूध पिला रही हों, उन्हें इसका सेवन जरूर करना चाहिए, क्योंकि इसमें फाइबर की प्रचुरता होती है।

यदि आप अरबी का सेवन कर रहे हैं तो जान लें कि आपके शरीर में इंसुलिन और ग्लूकोज की मात्रा का बढ़िया संतुलन बना रहेगा। यही नहीं, बढ़ते वजन से भी परेशान हैं तो गडेरी का सेवन इसे भी घटाने में आपकी मदद करेगा, क्योंकि इसे खाने से आपकी भूख नियंत्रित हो जाती है। फाइबर की मौजूदगी से यह आपके मेटाबॉलिज्म को सक्रिय बनाने का काम करता है, जो आपको अपने वजन को नियंत्रित रखने में मददगार होता है। साथ ही पाचन क्रिया भी आपकी इन्हीं फाइबर्स की वजह से बेहतर हो जाती है। गडेरी विटामिन सी से भरपूर भी है जो की शरीर की प्रतिरक्षा को बढ़ाता है।

स्कूलों में उगाने की पहल

उत्तराखण्ड में शिक्षा विभाग की ओर से एक नया प्रयोग शुरू किया गया है। इसमें अब स्कूलों में ही गडेरी, पालक, धनिया और भिंडी जैसी सब्जियां उगाई जा रही हैं, जिन्हें पकाकर मिड डे मील में बच्चों को परोसा जा रहा है। चूंकि सब्जी सीधे तौर पर बच्चों को मिल रही है, ऐसे में उन्हें एकदम ताजा व पौष्टिक एवं कैमिकल से मुक्त सब्जियां खाने को मिल रही है, जिसका लाभ उनकी सेहत को मिल रहा है। बागेश्वर जिले के कई स्कूलों में भी किचन गार्डन विकसित कर लिया गया है। यहां पूरे सालभर सब्जियां उगाई जा रही हैं। शिक्षा विभाग की ओर से भी इसे प्रोत्साहित किया जा रहा है, क्योंकि स्कूलों में किचन गार्डन होने से बच्चों को ताजी सब्जियां खाने को मिल पा रही हैं।

सरकार से अपेक्षाएं

जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक और लोगों के पलायन की वजह से गडेरी के उत्पादन में थोड़ी कमी पहले की तुलना में जरूर आई है, मगर अब भी पिथौरागढ़ के साथ चम्पावत आदि जिलों में इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर हो रहा है। जरूरत इस बात की है कि सरकार इन पहाड़ी सब्जियों को भी पाठ्यक्रम में शामिल करने और कृषि विषय के अंतर्गत इसे पैदा किये जाने के वैज्ञानिक व पारंपरिक तरीकों को शामिल करने की पहल करे, ताकि पहाड़ी इलाकों में न केवल रोजगार के नये अवसर सृजित किये जा सकें, बल्कि पलायन की समस्या को रोकने के साथ ही यहां के लोगों को पौष्टिक भोजन भी नसीब हो सके।

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