Nainital- पौराणिकता से आधुनिकता की ओर

on May 21, 2020

'देवभूमि उत्तराखण्ड' को देवताओं की भूमि' की संज्ञा ऐसे ही नहीं दी गयी है, इसके पीछे है वह दैवीय मान्यताएं और विश्वास जो पौराणिक काल से ही यहाँ पर देवी-देवताओ के निवास स्थान होने की पुष्टि करता है। पाठको, हमारा प्रयास रहता है कि हम ऐसे ही पौराणिक तथ्यों तथा जन-श्रुतियो को आपके सम्मुख लाते रहें।

आज हम बताने जा रहे है ऐसे स्थान की पौराणिकता को जिसे पुराणों में "त्रिऋषि सरोवर', हिंदी में 'सरोवर नगरी', इंग्लिश में 'Lake District of India" और विश्व मानचित्र पर 'नैनीताल' के नाम से जाना जाता है। मित्रो, नैनीताल की ख़ूबसूरती और मौसम के बारे में तो आप लोगो को थोड़ा बहुत ज्ञान अवश्य होगा, आज हम इस लेख के माध्यम से यह जानने का प्रयास करेंगे, कैसे एक अमुक स्थान, नैनीताल बन जाता है और क्या है नैनीताल का पौराणिकता से सम्बन्ध।

History of Naninital

नैनीताल उत्तराखंड राज्य के नैनीताल जिले में समुद्रतल से 1938 मीटर पर स्थित खूबसूरत पहाड़ी नगर है। 'स्कन्द पुराण' में यह स्थान 'त्रिऋषि सरोवर' सरोवर नाम से वर्णित है, क्यूंकि यह स्थान तीन ऋषियो - अत्री, पुलस्‍त्‍य और पुलह की तपस्या स्थली रहा है। वर्तमान में इसे नैनीताल नाम से जाना जाता है क्योकि यहाँ पर माँ नैना देवी का भव्य मंदिर स्थित है।

पौराणिक नैनीताल

'त्रिऋषि सरोवर' कहलाने की कहानी 

नैनीताल की उत्पत्ति एवं पहचान के पीछे दो पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं, पहली 'स्कन्द पुराण' के अनुसार,जब अत्री, पुलस्‍त्‍य और पुलह ऋषि अपने हिमालय भ्रमण पथ पर थे, तब वे इस स्थान से होकर गुजरे थे, ऋषियों को इस स्थान की रमणीकता इतनी भा गयी, कि उन्होंने इस स्थान पर तप करने का निश्चय किया, किन्तु आप-पास जल का कोई स्रोत नहीं होने से वे तीनो जल-स्रोत के उदगम उपाय पर विचार करने लगे, उन तीनो ऋषियों ने अपने तपोबल से कैलाश में स्थित मानसरोवर झील के जल का सन्धान किया तथा अपने त्रिशूल से भूमि पर प्रहार कर उस जल को यहाँ पर प्रस्फुटित किया, जिससे यहाँ पर सरोवर का निर्माण हो गया और यह स्थान 'त्रिऋषि सरोवर' के नाम से जाना गया।

जब उदय हुआ नैनीताल का 

दूसरी पौराणिक कथा माँ नैना देवी से सम्बंधित है, यह स्थान 64 देवी शक्ति पीठो में से एक है, शिव पुराण के अनुसार, प्रजापति दक्षराज की पुत्री देवी सती का विवाह भगवान शिव के साथ हुवा था, किन्तु इस विवाह से प्रजापति प्रसन्न नहीं थे क्योकि वे भगवान शिव को देव न मानकर केवल एक साधु मानते थे, परन्तु पुत्री-हठ तथा देवताओ के प्रयास से देवी सती का विवाह भगवान शिव के साथ हो जाता है।

कालांतर में प्रजापति दक्षराज द्वारा एक यज्ञ का आयोजन किया गया था, इस आयोजन में सभी देवी-देवताओ को आमंत्रण दिया गया, किन्तु भगवान शिव एवं देवी सती को निमंत्रण नहीं दिया गया। इस बात से आहत देवी सती भगवान शिव के मना करने के बावजूद स्त्री-हठ के कारण अपने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ में चली जाती है, यज्ञ में देवी सती का बिना आमंत्रण के आ जाना प्रजापति दक्ष को यज्ञ का अपमान लगता है, वे देवी सती को बुरी तरह अपमानित करते है तथा भगवान शिव को भी अपमानित कर देते है। पति के अपमान से आहत देवी सती, अगले जन्म में भगवान शिव की पत्नी के रूप में ही अवतरित होने की बात कह कर यज्ञ की ज्वाला में प्रवेश कर जाती है और यज्ञ को विफल कर देती है।

जब यह बात भगवान शिव को पता चलती है तो वे क्रोधित हो जाते है, क्रोधाग्नि में जलते हुवे भगवान शिव देवी सती के शव को लेकर व्यथित अवस्था में आकाश भ्रमण पर निकल पड़ते है। भगवान शिव की इस स्थिति का प्रभाव सृष्टि-संचालन न पड़े इस हेतु देवी सती के भौतिक शरीर को भगवान शिव से दूर करना आवश्यक हो जाता है, तब भगवान विष्णु द्वारा चक्र से देवी सती के भौतिक शरीर को खंडो में विभाजित कर दिया जाता है, ये खंड भूमि में जिस -जिस स्थान पर गिरे, वह स्थान देवी शक्ति पीठ बन गया, इस प्रकार से देवी सती के भौतिक शरीर को 64 खंडो में विभाजित किया गया उन्ही खंडो में से एक खंड नैनीताल में गिरा था,यहाँ पर देवी सती की बायीं आंख गिरी थी जिससे बहने वाले अश्रुओ से यहाँ पर झील का निर्माण हो गया था। बाद में आंख वाला स्थान 'नैना देवी' नाम से शक्ति -पीठ के रूप में प्रसिद्ध हुवा और माँ नैना देवी के नाम पर इस झील का नाम 'नैनीताल' पड़ा.

नैना देवी के बारे में 

यहाँ 'नैना देवी' की पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में पूजा होती है, नैना देवी नाम से उत्तराखण्ड में एक पर्वत चोटी भी है, स्कंद पुराण के मानस खंड के अनुसार इस चोटी के शिखर में माँ नैना का वास माना गया है तथा राज्य में नंदा देवी नाम से एक वन्यजीव अभ्यारण्य भी है। माँ नैना देवी एक मात्र ऐसी देवी है जिनकी पूजा गढ़वाल मंडल एवं कुमाऊँ मंडल वाले लोग एक साथ मिलकर करते है।

Naina devi nainital

नैनीताल के अतिरिक्त अल्मोड़ा, बागेश्वर, भवाली तथा गढ़वाल मंडल में भी माँ नैना देवी के मंदिर है, सुविख्यात 'नंदा राजजात' यात्रा, माँ नैना को उनके ससुराल कैलाश तक पहुंचाने की यात्रा का ही प्रतीकात्मक रूप है। माँ नैना, जो की दक्षराज की पुत्री थी, वो कैसे हिमालय राज की पुत्री बनी इस रहस्य की गूढता को समझने के लिए माँ नैना देवी के बारे में और अधिक जानना होगा, जैसा की हम पहले ही बता चुके है जब देवी सती यज्ञ कुंड में प्रवेश करती है तो वो यह बात बोलती है कि- भगवान शिव की पत्नी के रूप में उनका पुनः जन्म होगा उसी वचन की सार्थकता हेतु देवी सती का पर्वतराज हिमालय के घर में देवी उमा(पार्वती) के रूप में जन्म हुवा था। इसके पश्चात उनका बड़ी धूमधाम से भगवान शिव के साथ विवाह हुवा था।

इसके प्रत्येक बारह वर्ष बाद माँ नैना अपने मायके हिमालयराज के घर आती है और उनको ससुराल विदा करने के लिए मायके वाले कैलाश जाते है, स्मृति स्वरुप आज भी प्रत्येक 12 वर्ष पश्चात' नंदा राजजात यात्रा' के रूप में इस प्रथा को निभाया जाता है,'नंदा राजजात यात्रा' विश्व की सबसे लम्बी पैदल धार्मिक यात्रा है।

माँ Naina Devi की पूजा-अर्चना

वर्तमान में नैनीताल, भवाली, अल्मोड़ा, बागेश्वर तथा गढ़वाल मंडल में भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को माँ नैना देवी की सम्पूर्ण वैदिक विधान से पूजा-अर्चना करने की परम्परा है, इस दिवस को नंदा-अष्टमी के नाम से जाना जाता है स्थानीय विद्यालयों/कार्यालयों में इस दिन अवकाश रहता है तथा सभी बढ़ -चढ़कर इस उत्सव में भाग लेते है।

इस लेख के माध्यम से हम यह बात स्पष्ट करते हुवे आगे बढ़ रहे है की राज्य में माँ नैना देवी को 'माँ नंदा' नाम से भी जाना जाता है और ऐसा माना जाता है क़ि 'सुनंदा' नाम से उनकी एक बहन भी थी। कदली वृक्ष( केले का पेड़) के तने से माँ नंदा-सुनंदा की नंदा देवी चोटी सरीखी प्रतिमाये बनायीं जाती है तथा इन्ही प्रतिमाओ की विधि-पूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है।

माँ की प्रतिमा कदली वृक्ष से ही क्यों बनायीं जाती है किसी और वृक्ष से क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर इस लोककथा के माध्यम से मिलता है, एक समय की बात है माँ नंदा-सुनंदा के पीछे एक दैत्य पड़ा था, माताओ को भयभीत करने हेतु उसने विशाल भैसे(कटरा) का रूप ले लिया और माँ नंदा-सुनंदा का पीछा करने लगा उससे भयभीत दोनों बहनें एक कदली वृक्ष की झाड़ी के पीछे छिप गयी, इस प्रकार से उस दैत्य से माँ नंदा-सुनंदा की रक्षा हुवी तभी से कदली वृक्ष को पूजनीय माना गया है चूँकि कदली वृक्ष के माध्यम से माँ की रक्षा हुवी इसी फल स्वरुप इसी के तने से स्मृति स्वरुप माँ नंदा-सुनंदा की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा की जाती है। इस अवसर पर 7 दिवस के मेले का आयोजन किया जाता है जिसमे स्थानीय संस्कृति की खूबसूरत छटा देखते ही बनती है।

आधुनिक नैनीताल 

आधुनिक नैनीताल अपनी खोज से पूर्व सातवीं शताब्दी में, कत्यूरी राजवंश, चंद शासक, गढ़वाल के शाह वंश, गोरखा राजाओ तथा अंत में 1815 में 'ईस्ट इंडिया कंपनी' द्वारा शासित था।

Nainital History and Mythology

सन 1842 में अंग्रेज व्यापारी पी. बैरन यहाँ पर पहुंचे थे तभी से आधुनिक नैनीताल की खोज का श्रेय उन्हें जाता है। पी. बैरन शाहजहांपुर के चीनी के व्यापारी थे उनको पहाड़ो की वादियों में घूमना पसंद था, वे पहले बद्रीनाथ, केदारनाथ की यात्रा कर चुके थे, कुमाऊँ की यात्रा के दौरान जब वे 'खैरना' (भवाली -अल्मोड़ा राजमार्ग पर स्थित कस्बा) प्रवास पर थे तब स्थानीय लोगो की जानकारी से उन्होंने 'शेर का डाण्डा' से नैनीताल में प्रवेश किया और यहाँ की ख़ूबसूरती से इतने प्रभावित हुवे कि उन्होंने नैनीताल को खरीदने के लिए उसके मालिक थोकदार नूर सिंह से संपर्क किया, थोकदार नूर सिंह पहले तो नैनीताल हो बेचने हेतु राजी हो गए थे,किन्तु बाद में उन्होंने नैनीताल को बेचने से इंकार कर दिया था। परन्तु पी. बैरन नैनीताल की खूबसूरती से इतने प्रभावित थे कि हर कीमत पर खरीदने को तैयार थे और एक दिन छल-पूर्वक पी. बैरन,थोकदार नूर सिंह को लेकर नाव द्वारा नैनीताल की सैर में निकले तथा बीच तालाब में ले जाकर थोकदार नूर सिंह को जान से मारने की धमकी देकर नैनीताल को बल-पूर्वक अपने नाम करवा लिया।

आधुनिक नैनीताल की नीव

पी. बैरन ने ही आधुनिक नैनीताल की नीव रखी तथा यहाँ पर भवनों के निर्माण का कार्य करवाया, सर्वप्रथम उन्होंने पिरग्रिम कॉटेज का निर्माण किया था। 1850 में यहाँ नैनीताल नगर निगम की स्थापना की गयी उसके बाद शहर में शानदार बंगलों के विकास और विपणन क्षेत्रों, विश्रामगृहों, मनोरंजन केंद्रों, क्लब आदि जैसी सुविधाओं के निर्माण के साथ सचिवालय और अन्य प्रशासनिक इकाइयों का निर्माण हुआ जिसमे वर्तमान राजभवन तथा उच्च न्यायालय भी शामिल है । यह अंग्रेजों के लिए शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी बन गया, जो अपने बच्चों को बेहतर हवा में और मैदानी इलाकों की असुविधाओं से दूर शिक्षित करना चाहते थे।

सन् 1862 में नैनीताल को तत्कालीन उत्तरी पश्चिमी प्रान्त की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया गया, बाद में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा भी नैनीताल का उपयोग ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में किया गया था। सन 1880 से पूर्व नैनीताल में 'चाइना पीक' नाम से एक चोटी हुवा करती थी जहाँ से 'चीन की दीवार' को आसानी से देखा जा सकता था, जिस कारण से इस स्थान को 'चाइना पीक' कहा जाता था। किन्तु सन 1880 में आये विनाशकारी भूकंप से 'चाइना पीक ' में भूस्खलन हो गया इसका बहुत बड़ा भाग टूट-कर नैनीताल के किनारे पर आ गया था, जिससे 'माँ नैना देवी' के मंदिर को भी बहुत नुकसान पंहुचा था। जो मलवा नैनीताल के समीप आया था उसे पाट कर नैनीताल 'फ्लैट्स' मैदान का निर्माण किया गया और 'माँ नैना देवी' के मंदिर का भी पुनः निर्माण किया गया था। इस घटना के पश्चात 'चाइना पीक' क्षेत्र को 'नैना पीक' के नाम से जाना जाता है।

अंग्रेज शासक शिमला, डलहौजी की तर्ज में नैनीताल में भी रेल लाना चाहते थे, इसके लिए उन्होंने पूरी कार्य-योजना भी बनायीं थी , किन्तु सर्वेक्षण के दौरान पाया गया की नैनीताल की पहाड़ियों में भू-स्खलन की दृष्टि से सुरक्षित नहीं है, उन्हें इसके लिए की दूसरी युक्ति प्रयोग में लानी होगी। उसके पश्चात् हमारे देश से अंग्रेजो के शासन का अंत हो गया और यह योजना यही बंद हो गयी। आजादी के पश्चात् केंद्र सरकार द्वारा रेल को काठगोदाम से नैनीताल तक ले जाने के प्रयास किये गए थे परन्तु वो अभी तक पूर्ण नहीं हो पाये है। आधुनिक नैनीताल को अभी रेल के लिए और इंतजार करना पड़ेगा, हम आशा करते है निकट भविष्य में महानगर मेट्रो की तर्ज पर हम नैनीताल को रेल द्वारा देश के शेष भागो से जोड़ पाएंगे।

चलते - चलते 

पाठको, हम आशा करते हैं, नैनीताल की पौराणिकता से आधुनिकता की यह यात्रा और उससे सम्बंधित तथ्य तथा जनश्रुतियों से आपको रूबरू कराने का हमारा यह छोटा सा प्रयास आपको पसंद आया होगा, हो सकता है इसमें कई जानकारियां हमसे छूट गयी होंगी उनके लिए हम क्षमा प्रार्थी हैं, हम उम्मीद करते है की ऐसी जानकारियां जो नैनीताल के बारे में आपको पता है और आप पाठको तक पहुंचना चाहते है उसे कमैंट्स के माध्यम से हमसे साझा कीजिये। हम उन जानकारियों को पाठको तक आने वाले लेखो के माध्यम से पहुंचाने का प्रयास करेंगे, धन्यवाद। 

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