उत्तराखंड का सुप्रसिद्ध देवीधुरा बग्वाल मेला

on May 14, 2020

उत्तराखण्ड राज्य में ऐसे अनेको साक्ष्य मौजूद हैं जो इसकी पौराणिकता को प्रमाणित करते हैंआज हम ऐसे ही एक स्थान एवं स्थानीय मेले के बारे में बात करेंगे जो अपनी ऐतिहासिकता तथा विलक्षणता के लिए विश्व प्रसिद्ध है, हम बात करेंगे 'बग्वाल मेला' के विषय में, यहाँ पर आयोजित होने वाला 'पाषाण युद्ध' जन- मानस लिए कौतुहल का विषय है। बग्वाल मेले का आयोजन चम्पावत जिले के 'देवीधूरा' में माँ बाराही धाम के प्रांगण में प्रत्येक वर्ष श्रावण मास की एकादशी से कृष्णजन्माष्टमी तक किया जाता है और यहाँ श्रावण मास की पूर्णिमा (रक्षाबंधन) को 'पाषाण युद्ध' का आयोजन किया जाता है।

Uttarakhand Devidhura Bagwal Mela (fair)

देवीधूरा के बारे में

देवीधूरा  समुद्रतल  से 6500 फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित है, यह चम्पावत से 55 KM की दूरी तथा हल्द्वानी से 108 KM की दूरी पर स्तिथ है। देवीधूरा ऐतिहासिक दृष्टि के अलावा राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है क्योकि ये चम्पावत को अल्मोड़ा जिले से जोड़ने वाले मार्ग में स्तिथ है।

क्या है देवीधूरा का बग्वाल मेला (Bagwal Fair)?

"बग्वाल’’ एक तरह का पाषाण युद्ध है जिसको देखने देश के कोने-कोने से दर्शनार्थी यहाँ पहुंचते है। मान्यता है कि बग्वाल खेलने वाला व्यक्ति यदि पूर्णरूप से शुद्ध व पवित्रता रखता है तो उसे पत्थरों की चोट नहीं लगती है। सांस्कृतिक प्रेमियों के परम्परागत लोक संस्कृति के दर्शन भी इस मेले के दौरान होते हैं। देवीधूरा माँ बाराही धाम एवं 'बग्वाल' के बारे में अधिक जानकारी के लिए हमें इसके इतिहास के बारे में जानना होगा।

बग्वाल मेले का इतिहास और पौराणिक कथायें

'बग्वाल' का आयोजन प्राचीन काल से प्रचलित 'नर-बलि' के 'प्रतीकात्मक' स्वरुप या 'स्मृति' स्वरुप किया जाता है। इसके बारे में अधिक जानकारी इसके इतिहास से प्राप्त होती है। सर्व्रथम हम ज्ञान प्राप्त करते है माँ बाराही के बारे में विष्णु पुराण से, जो कहता है की भगवान विष्णु ने बराह अवतार लेकर जलमग्न धरती माँ को समुद्र से निकला था तथा हिरण्याक्ष असुर का वध किया था। ऐसी मान्यता है कि तब से धरती माँ 'बाराही' नाम से यहाँ वास करती है और क्षेत्रीय जन-मानस की विपत्तियों से रक्षा करती है। कालांतर में दानवीय शक्तियों के अत्याचार से जन-मानस की रक्षा की थी तथा रक्षा स्वरुप प्रत्येक वर्ष नर-बलि की मांग की थी उस समय यहाँ पर मुख्य रूप से चार जातियां निवास करती थी, गहड़वाल, चम्याल, वालिक तथा लमगडिया। इन जातियों ये यह निश्चय किया कि प्रत्येक वर्ष बारी-बारी से चारो जातियों में से किसी एक के परिवार से एक व्यक्ति की नर-बलि दी जाएगी। एक समय कि बात है चम्याल जाति में से जिस परिवार की नर-बलि की बारी थी उसमे केवल एक वृद्धा तथा उसका पोता ही रहता थे, उस वृद्धा ने माँ बाराही से प्रार्थना की उसका  कुल आगे कैसे बढ़ेगा यदि उसने अपने आखरी वंशज भी बलि दे दिया। तब माँ बाराही ने उसे सपने में दर्शन देकर रास्ता सुझाया कि यदि एक नर के बराबर रक्त किसी अन्य माध्यम से भी अर्पित किया जायेगा तो भी माँ बाराही प्रसन्न हो जाएगी। तब से यहाँ पर हर वर्ष 'पाषाण युद्ध' का आयोजन किया जाने लगा था, जब एक व्यक्ति के बराबर रक्त बह जाता है तो 'पाषाण युद्ध' की समाप्ति की घोषणा कर दी जाती थी.

पाषाण युद्ध के बारे में 

वर्तमान मे गहरवाल, चम्याल, वालिक तथा लमगड़िया, जातियों को ख़ाम के नाम से जाना जाता है। ये चारो ख़ाम आपस मे दो दल बनाकर पाषाण युद्ध करते है। इस पाषाण युद्ध की तैयारी के लिये ये लोग अपने घर को छोड़कर मंदिर मे ही रहते है तथा मन, वचन और कर्म से पवित्रता का आचरण करते है, प्रायः चार ख़ाम के युवा, प्रौढ़ तथा वयस्क पुरुष ही इसमे सम्मिलित होते है। इसकी तैयारी 1 मास पूर्व से ही प्रारम्भ हो जाती है। इस अवधि मे इनका बाहरी सांसारिक गतिविधियों से संपर्क निषिद्ध होता है, यदि ऐसा नहीं होता है तो किसी के परिवार मे किसी प्रकार की घटना होने पर भी इनका घर जाना निषिद्ध रहता है। आज के संज्ञान मे यह एक बहुत कठिन तपस्या के समान है। वर्तमान मे स्थानीय ग्रामीण लोग भी पाषाण युद्ध मे प्रतिभाग करते है चूँकि रक्षाबंधन पर्व के दिन बग्वाल खेली जाती है तथापि स्थानीय बालिकाएं अपने भाई को रक्षा-सूत्र बांधकर युद्ध के लिए सज्ज करती है और युद्ध मे प्रयोग होने वाले पत्थरों से सुसज्जित करती है। युद्ध मे बचाव के लिये प्रयोग होने वाली ढाल को छन्तोली या फर्र कहते है ये बांस की बनी होती है। बग्वाल वाले दिन चारो ख़ाम के सदस्य अलग अलग दिशाओं से मंदिर मे प्रवेश करते है और मंदिर की परिक्रमा करते है। उसके पश्चात मंदिर प्रांगण मे स्थित मैदान मे, ये दो दलों मे विभक्त हो जाते है, उसके बाद प्रारंभ होता है विश्व प्रसिद्ध पाषाण युद्ध। इस पाषाण युद्ध को देखने देश - विदेश से अनेकों श्रद्धालु यहाँ आते है तथा उस विलक्षण संस्कृति तथा युद्ध के साक्षी बनते है।

पाषाण युद्ध मे निशाना लगाकर पत्थर फेंकना निषिद्ध होता है, ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति मन, वचन, कर्म से पवित्र होता है उसे ये पत्थर नहीं लगते हैं,तथा पाषाण युद्ध के दौरान घायल व्यक्ति स्थानीय बिच्छू बूटी लेप प्रयोग से बहुत जल्दी स्वस्थ हो जाता है। जब मंदिर के मुख्य पुजारी को अन्तःकरण से यह आभास हो जाता है कि युद्ध मे एक व्यक्ति के रक्त के बराबर रक्त बह चुका है तो वह युद्ध मैदान मे आकर शंख बजाकर युद्ध समाप्ति की घोषणा करते है। इस प्रकार से दोनों दलों के सदस्य आपस मे गले मिलकर युद्ध के दौरान की घटनाओं के लिये माफी मांगते और देते हैं। 

मेले के दौरान स्थानीय लोगों द्वारा तथा बाहर से आये कलाकारों द्वारा बहुत से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का प्रदर्शन किया जाता है तथा झोड़ा, छपेली, न्योली, चांचरी, भगनौल तथा बैर आदि भी गाये जाते है।

बग्वाल से जुड़ी कुछ रोचक बातें

ऐसा माना जाता है कि माँ बाराही यहाँ पर जागृत अवस्था में वास करती है भारतवर्ष में यह उन दुर्लभ मंदिरो में से एक है जहाँ माँ जागृत अवस्था में रहती है। धाम के मुख्य मंदिर में एक बंद संदूक में माँ को रखा गया है चूकि माँ यहाँ दिव्य रूप में वास करती है इसीलिए माँ को वर्ष में केवल एक बार बाहर निकाला जाता है उस समय मंदिर के मुख्य पुजारी आँखों में पट्टी बांधकर माँ को स्नान एवं नवीन वस्त्र पहनाते है।

पाषाण युद्ध के अगले दिन माँ को डोले में बैठाकर पूरे नगर की यात्रा करायी जाती है इस दौरान श्रद्धालु माँ के डोले में कन्धा लगाते फूल, भेंट, टीका, चंदन, अक्षत लगाते है तथा शीश नवाते है। इस दौरान भक्तजन माता के गणो( सेवक) को प्रसन्न करने हेतु बकरे की बलि भी देते है

विगत कुछ वर्षो से माननीय उच्च न्यायालय, नैनीताल के आदेश पर युद्ध में पत्थरो के प्रयोग के स्थान पर फलो व फूलो का उपयोग किया जाने लगा है मानवता की दृस्टि से ये एक साहसिक निर्णय है उद्देश्य वही पर साधन बदल गए है।

यहाँ पर मुख्य मंदिर के अतिरिक्त गणेश मंदिर, काली मंदिर, देवकुल रक्षक भैरव मंदिर, शक्ति गुफा, कलुवा बैताल मंदिर, भीम शिला आदि दर्शनीय स्थल है। शक्ति गुफा दो विशाल शिलाओं के मध्य दरार में बेहद ही संकरी गुफा है इसके अंदर की परिक्रमा करना शुभ माना जाता है, बेहद ही संकरी होने के बावजूद श्रद्धालु जन इसमें आसानी से प्रवेश कर जाते है, गुफा के अंत में माता के भोजन की रसोई है जिसमे माता के भोग के लिए भोजन एवं प्रसाद बनता हैं।

यहाँ पर तीन बड़ी बड़ी शिलाये है जो क्रमशः एक दूसरे के ऊपर रखी गयी है जिन्हे भीम शिला कहते है जैसा की हम पहले ही बता चुके है कि उत्तराखण्ड की पौराणिकता को प्रदर्शित करते शाक्ष्य यहाँ आज भी मौजूद है ऐसा ही एक शाक्ष्य है भीम-शिला जो इस स्थान को महाभारत काल से जोड़ता है, ऐसा माना जाता है कि पांडवो ने अपना अज्ञातवास का समय यहाँ बिताया था भीम-शिला में बहुत गहरी दरार है जिसे भीम के तलवार के प्रहार के फलस्वरूप उत्पन्न हुवा माना जाता है, तथा सबसे ऊपर जो शिला रखी गयी है उसमे भीम की पांच अंगुलियों के निशान आज भी मौजूद है, भीमशिला के एक स्थान में से एक तैलीय पदार्थ रिसता रहता है जिसे पवित्र माना जाता है तथा इसे श्रद्धालुओं के द्वारा माथे तथा सिर में लगाया जाता है।

देवीधुरा, बग्वाल और प्राकृतिक का आनंद 

यदि आप यहाँ पर आते है तो माता के दर्शन के साथ-साथ यहाँ चारो ओर बांज, देवदार तथा बुरांश के जंगलो की हरियाली का आनंद उठा सकते है, जो मानव मस्तिष्क तथा मन को असीम शांति प्रदान करते है। इसके साथ यहाँ सबसे दर्शनीय जो तस्वीर है वो है यहाँ से दिखायी देती 300 KM लम्बी हिमालयी पर्वत मालाएं जिसमे त्रिशूल, नंदादेवी, पंचाचूली, नंदाघुंटी, चौखम्बा, नर-नारायण पर्वत तथा रूपकुंड आदि प्रमुख है। हिमालयी पर्वत मालाओ का इतना विस्तृत फैलाव किसी अन्य स्थान से देख पाना संभव नहीं है।

देवीधूरा की नजदीकी बड़ी बाजार पाटी है जो यहाँ से लगभग 20 KM की दूरी पर स्तिथ है, यहाँ अन्य नजदीकी दर्शनीय स्थलों में बाणासुर का किला, रीठा साहिब गुरुद्वारा, अबौट माऊंट, पंचेश्वर मंदिर, कांतेश्वर मंदिर आदि प्रमुख हैं।

चलते-चलते 

प्रिय पाठको, हमने इस लेख के माध्यम से उत्तराखण्ड की एक रोचक पौराणिक सांस्कृतिक धरोहर को आप तक पहुँचाने की कोशिश की है यदि आपको हमारा प्रयास पसंद आया हो तो हमे कमेंट के द्वारा बताएं जिससे की हम ऐसी रोचक जानकारी आप तक पहुँचाते रहे, धन्यवाद।

 

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