खाने की तासीर बदल देते हैं उत्तराखंड के यह मसाले (Spices from Uttarakhand)

on June 19, 2020

विश्वभर में उत्तराखंड अपनी नैसर्गिकी के साथ-साथ अपनी खान-पान संस्कृति के लिए भी जाना जाता है। राज्य की कढ़ी (पाल्यो), चुड़कानी , च्यूक, राजमा तथा अन्य खड़ी दालें देशभर में बड़े चाव से खायी जाती हैं। उत्तराखंड के व्यंजनों को स्वादिष्ट एवं गुणकारी बनाने वाले कारको में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, राज्य के पहाड़ी मसाले। आज हम उत्तराखण्ड में उत्पादित होने वाले मसालों के बारे में बात करेंगे। चूँकि उत्तराखण्ड राज्य प्रकृति की गोद में बसा है। प्रकृति ने इसे अनेक प्राकृतिक जड़ीबूटी तथा वृक्षों से भरा है। राज्य में इन प्राकृतिक जड़ीबूटियों से ही विभिन्न प्रकार के मसाले प्राप्त किये जाते हैं । जो उत्तराखण्ड के भोजन को स्वादिष्ट एवं गुणकारी बना देते हैं ।

Spices of Uttarakhand

पहाड़ी मसालों की देश-विदेश में भारी मांग है तथा खान-पान के शौक़ीन लोग अक्सर राज्य में मसालों की सुगंध से खींचे चले आते हैं । ऐसे ही प्रमुख मसालों का प्रयोग एवं गुण हम आपको बताने जा रहे हैं। तो चलिए प्रारम्भ करते है।

Type of Spices From Uttarakhand

जम्बू (Jamboo/ Jambu/ Faran)

  • 10000 फ़ीट की ऊंचाई पर पाया जाने वाला जम्बू मसालाउत्तराखण्ड के उच्च हिमालयी क्षेत्र पिथौरागढ़धारचूलामुनस्यारीनीति-माणा आदि में बहुतायत में पाया जाता है।  
  • जम्बू,लहसुन/प्याज की पत्तियों के समान ही होता है इसकी पत्तियों को सुखाकर इसका प्रयोग तड़के (छोंके) के रूप में किया जाता है।  
  • जम्बू की तासीर गर्म होती है तथा यह अपनी मनमोहक खुशबु के लिए जाना जाता है। इसके जायके को और अधिक बढ़ाने के लिए इसके साथ घी का प्रयोग किया जाता है।  
  • मुख्यतौर पर जम्बू का प्रयोग मांस, दाल, सब्जी, सूप, सलाद और अचार के साथ किया जाता है। 
  • जम्बू का वानस्पतिक नाम एलियम स्ट्राकेई (Allium Stracheyi) है। जम्बू को अपने औषधीय गुणों के कारण भी जाना जाता है।
  • इसमें एलिसिन, एलिन, डाइ एलाइन सल्फाइड के साथ-साथ अन्य सल्फर यौगिक मौजूद रहते  हैं। जिस वजह से इसका उपयोग बुखार, गीली खांसी और पेटदर्द में किया जाता है। 

 

 गंदरायण (Gandherni or Gandhryedi )

  • गंदरायण का वानस्पतिक नाम एन्जेलिका ग्लोका (Angelica Glauca) है तथा यह एपिएसी (Apiaceae) परिवार का पौधा है।
  • उत्तराखण्ड में इसे गंदरायण या छिप्पी, हिमाचल प्रदेश में चमचोरा या चौरू, कश्मीर में चोहारे आदि नाम से जाना जाता है।
  • आयुर्वेद में इसे चोरक नाम से जाना जाता है। हिंदी में इसे चोरा नाम से पुकारा जाता है तथा इंग्लिश में इसे एन्जेलिका कहते है।
  • गंदरायण हिमालयी क्षेत्र में 2000 से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। उत्तराखंड के अतिरिक्त यह हिमाचल, कश्मीर, उत्तरपूर्व, नेपाल, भूटान, तिब्बत, चीन, पाकिस्तान व अफगानिस्तान में भी पाया जाता है।
  • Gandherni के पौधे की जड़ तथा तने को छाया में सुखाकर, उससे गंदरायण मसाला प्राप्त किया जाता है। यह अपनी मनमोहक खुशबु तथा जायके के लिए जाना जाता है।
  • गंदरायण का प्रयोग आयुर्वेदिक औषधी के रूप में भी किया जाता है। यह एक उत्तम पाचक औषधी है, पेटदर्द एवं कब्ज में भी इसका सेवन लाभदायक होता है।
  • एसिडिटी,सिरदर्द, बुखार ,टायफायड , दिल तथा लिवर के लिए भी गंदरायण का उपयोग उत्तम माना जाता है।
  • इसकी मनमोहक सुगंध के कारण इसका प्रयोग घूप, अगरबत्ती, सुगन्धित तेल तथा सौंदर्य प्रसाधनों में किया जाता है।
  • मसालों के रूप में इसका प्रयोग तड़के के रूप में विशेष रूप से भट्ट की चुड़कानी, कढ़ी (झोई या पल्यो), राजमा, अरहर ,गहत आदि दालों के साथ किया जाता है।
  • Gandhryedi को एक अच्छा पशु चारा भी माना जाता है क्योकि इसके सेवन से पशुओ में दुग्ध वृद्धि होती है।
  • इसके अतिरिक्त इसकी जड़ो तथा बीजो से तेल का उत्पादन किया जाता है , जो काफी मूल्यवान उत्पाद माना जाता है।

 

जखिया (Jakhiya)

  • जखिया 800 से 1500 मीटर की ऊँचाई पर पाये जाने वाला सरसों समान पौधा होता है। इसका वानस्पतिक नाम क्लोमा विस्कोसा है।  
  • स्थानीय भाषा में इसे जख्या तथा इंग्लिश में एशियन स्पाइडर फ्लावरवाइल्ड डॉग या डॉग मस्टर्ड आदि नामो से जाना जाता है।  
  • Jakhiya का प्रयोग इसकी खुशबू एवं स्वाद के कारण जीरा या सरसों के विकल्प के रूप में किया जाता है।  
  • जाखिये का प्रयोग आलू, पिनालू, गडेरी, कद्दू, लौकी, तुरई, हरा साग, आलू-मूली के थेचुए और झोई कढ़ी आदि व्यंजनों में तड़का के रूप में किया जाता है।उत्तराखंड में सब्जियों के अतिरिक्त इसका प्रयोग मट्ठे में भी खूब किया जाता है। 
  • इण्टरनेशनल जर्नल आफ रिसर्च इन फार्मेसी एंड केमेस्ट्री में प्रकाशित शोध के अनुसार इसमें मौजूद उच्च एमिनो एसिड (amino acids) एवं मिनरल इसे हाई इकोनोमिक महत्व की वनस्पति का दर्जा देते हैं। 
  • खिया के अपने आयुर्वेदिक गुणों के कारण इसका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है
  • जखिया के एंटीसेप्टिकरक्तशोधकस्वेदकारीज्वरनाशक इत्यादि गुणों से युक्त होने के कारण बुखारखांसीहैजाएसिडिटीगठियाअल्सर आदि रोगों में इसका प्रयोग किया जाता है।  
  • जखिया की पत्तियों के रस को  घाव पर लगाने से घाव जल्दी भर जाते है।  
  • एक अन्य अध्ययन के अनुसार इसके बीजों से प्राप्त तेल जेट्रोफा की तरह ही बायोडीजल का भी एक स्रोत है  

भंगीराभंगजीरा (Bhangjeera)

  • भंगीरा का वानस्पतिक नाम पेरिल्ला फ्रुटेसेंस (Perilla Frutescens) है।
  • इंग्लिश पेरिल्ला तथा हिंदी एवं उत्तराखण्ड में भंगीरा के नाम से जाना जाता है। नेपाल में भंगीरा को सिलाम के नाम से जाना जाता है।
  • उत्तराखंड में यह 500 -1800 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। भंगीरा बंजर भूमि पर जंगली घास के साथ खुद ही उग जाता है।
  • भंगीरा मुख्य रूप से भारतीय हिमालय तथा चीन में पाया जाता है।
  • भंगीरे की पत्तियों को मसाले के साथ पीसकर उपयोग किया जाता है। इसकी पत्तियों को नमक एवं मिर्च के पीसकर चटपटा नमक तथा चटनी भी बनायीं जाती है।
  • भंगीरे के बीज का प्रयोग विशेष रूप से नमक बनाने तथा पकोड़े बनाने में किया जाता है।
  • इसके बने पकोड़ो को बड़े चाव के साथ खाया जाता है।
  • भंगीरे की पत्तियों के रस से कान सम्बन्धी दर्द में राहत मिलती है।
  • मेहंदी के रंग को पक्का करने के लिए भी भंगीरे की पत्तियों का उपयोग किया जाता है।

 काला जीरा / काली जीरी 

  • काली जीरी उत्तराखण्ड के हिमालयी क्षेत्र में 2700 से 3600 मीटर की ऊंचाई पर पाया जाता है। स्थानीय भाषा में इसे शियाजीरा, कालजीरा, शाहीजीरा, शिंगुजीरा आदि नामों से जाना जाता है।
  • पहले काली जीरी जंगलो में घास के रूप में उगती थी, वर्तमान में इसकी खेती की जा रही है। काली जीरी का पौधा गाजर के पौधे के समान होता है।
  • कालेजीरा के बीजो का प्रयोग छौंके के रूप में किया जाता है। उड़द की दाल और पिड़ालू (अरबी ) की सब्जी आदि में किया जाता है। इसका बाजार भाव 1500 रुपये प्रति किलोग्राम से शुरू है। 
  • उत्तराखंडके चमोली के जोशीमठ, पिथौरागढ़ के धारचूला, मुनस्यारी में काला जीरा की खेती की जाती है। यूरोपीय बाजारों में इसकी भारी मांग है।
  • कालाजीरा/ काली जीरी रक्त साफ़ करने में, घुटनों के दर्द में,जोड़ों के दर्द, बायी, पेट की बीमारियों, जैसे भूख न लगना, एसिडिटी, कब्ज में काफी मददगार है।
  • काली जीरी को पानी में उबाल कर सुबह खाली पेट पीने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
  • काले जीरे से तेल भी बनाया जाता है। बाजार में मिलने वाले सफेद जीरा की तुलना में इसकी सुगंध कई गुणा अधिक होती है। विदेशों में इसके सुगंधित तेल को उच्च क्वालिटी की शराब में मिलाकर सुगंधित बनाया जाता है।

तिमूर 

  • उत्तराखंड के पहाड़ी स्थलों में अत्यधिक मात्रा में पाया जाने वाले 'तिमूर' को, हिंदी में तेजबल, नेपाली धनिया नाम से जाना जाता है।
  • उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र में इसे तिमुर, संस्कृत में तुम्वरु, तेजोवटी, गढ़वाल में टिमरू, जापानी में किनोमे, यूनानी में कबाब-ए-खंडा , नेपाली में टिमूर आदि नामों से तिमूर को पहचाना जाता है।
  • तिमूर का वानस्पतिक नाम जेंथेजाइलम अरमेटम (Zanthoxylum Armatum) है तथा ये रूटेसी (Rutaceae) परिवार का वृक्ष है।
  • तिमूर के बीजो का प्रयोग इसके बेहतरीन स्वाद और खुशबू की वजह से मसाले के रूप में होता है।
  • उत्तराखण्ड में तिमूर की चटनी भी बनायी जाती है। इसका ख़ास तरह का खट्टा-मिंट फ्लेवर जुबान को हलकी झनझनाहट के साथ अलग ही जायका देता है।
  • चाइनीज, थाई और कोरियन व्यंजनों में तिमूर के बीजो का प्रयोग बहुत ज्यादा मात्रा में होता है। चाइनीज पेप्पर के नाम से जाना जाने वाला यह मसाला चीन के शेजवान प्रान्त की विश्वविख्यात शेजवान डिशेज का जरूरी मसाला है।

धनिया  

  • धनिया उत्तराखण्ड में लगभग सभी स्थानों में उगाया जाता है। सर्दियों के समय में ये बाजारों में अधिक मात्रा में दिखाई पड़ता है।
  • हरे धनिये की पत्तियों का प्रयोग व्यंजनों को सजाने और उनमें अच्छी सुगंध के लिए भी किया जाता है।
  • Dhaniya seeds का प्रयोग छोंके (बगार) के रूप में किया जाता है।
  • हरे धनिये की पत्तियों का नमक तथा इसके बीजो को भूनकर उसका लाल मिर्च के साथ नमक, पहाड़ी लोगो में काफी लोकप्रिय है।
  • धनिया पेट सम्बन्धी परेशानियों, नकसीर, आँखों में जलन तथा किडनी सम्बन्धी परेशानियों में लाभदायक होता है।
  • धनिया के कच्चे पत्तों में विटामिन A, C और K के गुण मौजूद है और इसके बीज में - फाइबर, कैल्शियम, कॉपर, आयरन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
  • धनिये का प्रयोग हम अपने चेहरे का कालापन, दाग और धब्बे को दूर करने के लिए करते हैं इसके अतिरिक्त काळा नमक और पानी के साथ इसके नियमित सेवन से पसीने की बदबू से भी निजात पायी जा सकती है।

 

 अन्य मसाले  

उपरोक्त type of spices from Uttarakhand के अतिरिक्त उत्तराखंड में अदरक, मिर्च, हल्दी, जीरा ,प्याज, राई , दैण, राड़ा, अमचूर आदि मसाले भी उगाये जाते है। अदरक, लहसुन का प्रयोग गरम मसाले के रूप में किया जाता हैं क्योंकि इनकी तासीर गरम होती है। अदरक, लहसुन उत्तम इम्युनिटी बूस्टर भी है।

राई का प्रयोग विशेषकर रायता बनाने में होता है, इसके प्रयोग से व्यंजन में तीखापन आ जाता है। दैण, राड़ा का प्रयोग बगार या छोंके के रूप में किया जाता है।सूखी लाल मिर्च का छौंका उत्तराखंड में लगाया जाने वाला एक सामान्य लेकिन प्रमुख छौंका है। 

भूनी हुई मिर्च का प्रयोग सब्जियों के उपर डालकर किया जाता है। इसे भोजन के साथ अलग से भी खाया जात है।  राज्य की हल्दी बहुत ही गुणकारी होती है।  यह एक उत्तम इम्युनिटी बूस्टर एवं पेनकिलर है। अमचूर का प्रयोग व्यंजन को चटपटा बनाने के लिए बहुतायत में किया जाता है। 

 चलते चलते  

चलते चलते हम आप लोगो से यही कहना चाहेंगे, यदि आप उत्तराखण्ड के मसालों का सही स्वाद लेना चाहते हैं तो आपको यहाँ आना चाहिए, या आप घर बैठे bigTokri से माँगा सकते हैं ।उत्तराखण्ड का मसाला लगा चटपटा भुट्टा तथा ककड़ी का स्वाद ही कुछ और है। हम विश्वास के साथ कह सकते हैं की जो आपको लाजवाब स्वाद एवं अनुभव उत्तराखंड में प्राप्त होगा, उसका विकल्प मिल पाना बहुत मुश्किल है। उत्तराखंड के मसालों की सुगंध के साथ मे, यहाँ कि सुंदरता दिलो -दिमाग मे इस तरह से बस जाती है कि लोग चाह कर भी इसे अपनी यादो से नहीं निकाल पाते हैं। 

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